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कोई शब्द पकाता है, पर पेट नहीं भरता,
कोई रोज हराता है अधिकार नहीं करता …

मिट्टी की दुनिया में, रोटी की चाहत से,
कोई रोज टूटता है आवाज नहीं करता …

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